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परमपद प्राप्ति हेतु आवश्य·—-आत्मनिरीक्षण

फरीदाबाद ( विनोद वैष्णव )| सतयुग दर्शन वसुन्धरा में आयोजित राम नवमी यज्ञ महोत्सव के द्वितीय दिवस सजनों को जाग्रत करते हुए सतयुग दर्शन ट्रस्ट के मार्गदर्शक श्री सजन जी ने कहा कि आत्मज्ञान सर्वश्रेष्ठ ज्ञान है 1योंकि हकीकत में जीव, जगत और ब्राहृ का खेल जना यही ह्नदय को आनन्द देने वाला है और इसी द्वारा जीव परमपद यानि मुक्ति पा सकता है। अत: इस महत्ता के दृष्टिगत आत्मज्ञान को अत्यंत महत्त्वपूर्ण उपल4िध मानो और साथ ही यह भी जानो कि यह उपल4िध विधिवत् गहन आत्मनिरीक्षण के अभाव में असंभव है। अन्य श4दों में आत्मनिरीक्षण को आत्मज्ञान का प्रथम सोपान समझो। आत्मनिरीक्षण से यहाँ तात्पर्य अपने भावों, वृत्तियों, गलतियों, त्रुटियों, दुर्बलताओं, गुण-दोषों को सही-सही जान-समझ कर, अपनी अच्छाईयों-बुराइयों पर विचार करने से है। इसी क्रिया द्वारा हम अपने व्यवहार, प्रवृत्तियों, अपनी योग्यताओं-अयोग्यताओं, अभिप्रेरणाओं आदि को स्वयं ही समझने का प्रयत्न कर सकते हैं और अपने दोषों का सूक्ष्म अवलोकन कर उनको दूर करने की दिशा में सक्रिय हो सकते हैं यानि आत्मनियन्त्रण द्वारा वांछित सुधार कर आत्मविश्वासी व आत्मनिर्भर बन सकते हैं। नि:संदेह ऐसा करने पर ही हम अपने आत्मिक बल के भरपूर प्रयोग द्वारा अपनी इन्द्रियों और मन को पूरी तरह से वश में रखते हुए, अंतर्निहित मानवीय गुणों में वृद्धि कर सकते है और मानवीयता को पुष्ट कर अपने व्यक्तित्व को परिष्कृत यानि सुधार कर संशोधित कर श्रेष्ठ मानव बन सकते हैं। सजन जी ने कहा कि यदि चाहते हो कि अपने मन और इंद्रियों पर पूर्णत: नियंत्रण रख स्वयं का सुधार कर सको तो रात्रि को सोने से पूर्व सही तरीके से अपना आत्मनिरीक्षण करना सुनिश्चित करो। इस हेतु हर तरफ से अपना ख़्याल व ध्यान हटाकर अपने मन पर केन्द्रित करो। इस तरह मन-चित्त जब एकाग्र, निर्मल व शांत हो जाए तो निर्दोषता पूर्ण जीवनयापन करने में सक्षम बनने हेतु आत्मदर्पण में अपने स्वाभाविक रूप को ठीक प्रकार से परखो। निश्चित ही इस प्रकार आत्मनिरीक्षण करने पर आपको उस दर्पण में एक दूसरा ही मनुष्य दिखाई देगा यानि अपना खोटा और कमियों भरा स्वाभाविक रूप नजऱ आएगा। इस रूप को देखकर घबराओ नहीं 1योंकि संसार के सभी पदार्थ, समस्त क्रियायें, संपूर्ण उपल4िधयाँ गुण-दोषमय हैं।इस प्रकार सजन जी ने सबको आश्वस्त करते हुए कहा कि आत्मनिरीक्षण के बिना दोषों का परित्याग व गुणों का ग्रहण नहीं हो सकता। अत: अब आप भी प्रतिदिन अपने अच्छे-बुरे दोनों ही पहलुओं को देखो और आप अभी जैसे हैं वैसे कैसे बने, इसका भली-भांति मूल्यांकन करो। देखो कि आपके अच्छे और बुरे गुण कौन से हैं और उन्हें आपने कैसे प्राप्त किया? यह जानने के पश्चात् अंतर्निहित इन बुरे गुणों को नष्ट करने की प्रक्रिया शुरु करो यानि अपने स्वभाव से दुर्गुणों को निकाल फेंको और आत्मिक गुणों को एक-एक करके आत्मसात् करना शुरु करो। ऐसा करने से आपकी सहज स्वाभाविक सुंदरता अपने आप निखर कर सामने आएगी। इस तरह फिर आप जैसे-जैसे एक-एक करके अपनी समस्त बुराईयों को पहचान कर उन्हें युक्तिसंगत उखाड़ कर फेंकते जाओगे वैसे-वैसे यह विश्वास अन्दर जाग्रत होगा कि मैं आत्मविजयी हो सकता हूँ। इस तरह आप अधिकाधिक बलवान बनते जाओगे और निर्भयता व सक्षमता से सदाचारिता पूर्ण जीवन जीते हुए सत्यनिष्ठ व धर्मज्ञ कहलाओगे।उन्होंने आगे कहा कि पूर्ण विजय प्राप्ति के लिए केवल रात्रि में ही नहीं अपितु दिनचर्या के दौरान भी यदा-कदा एक मिनट के लिए स्थिर होकर 1या कर रहे हो, 1या सोच रहे हो इसका विश्लेषण किया करो यानि अपने ख़्याल, वाणी व कर्म तीनों पर निगाहबानी रखा करो। इस तरह दिन-रात, चारों पहर सदैव सचेत रहो और देखो कि हमारे ह्नदयपटल पर 1या घट रहा है। इस तरह जो मानव धर्म के विरुद्ध हो व जिसे नहीं करना चाहिए उस ओर जब मन आकृष्ट होता प्रतीत हो तो उसे प्रयासपूर्वक रोको यानि वैसा न करने दो। ऐसा करने से आकर्षणों की ओर जाने के लिए मन सहज रूप से रुक जाएगा और प्रसन्नता से प्रभु में लीन रहना उसे अच्छा लगने लगेगा। इसके विपरीत यदि ऐसा न किया तो समुचित नैतिक अंकुश के अभाव में समस्त इन्द्रियाँ विद्रोही हो जाएँगी और मन बुद्धि पर हावी हो सब कुछ अस्त-व्यस्त कर देगा और आप स्वाभाविक रूप से भ्रष्टाचारी, दुराचारी व व्यभिचारी बन जाओगे। ऐसा न हो इस हेतु सजनों कदम-कदम पर विचार को पकडऩे की आदत डालो। इस संदर्भ में याद रखो कि विचार पर चलने वालों की ही सदा जीत-जीत और फतह-फतह होती है। ऐसा बुद्धिमान मानव ही आत्मविजय प्राप्त कर सकता है। आप भी आत्मनिरीक्षण की इस क्रिया को युक्तिसंगत करके व निश्चयात्मक बुद्धि द्वारा अपने मन व इन्द्रियों पर सहज ही विजय प्राप्त करने वाले आत्मविजयी बनो और सब दु:खों से छुटकारा पा सुख शांति से भरा आनन्दमय जीवन जीना आरमभ कर दो। अपने जीवन में ऐसा मंगलकारी परिवर्तन लाना अपने व समस्त समाज के कल्याण की बात समझो। अंत में उन्होंने सब सजनों से कहा कि ए विध् अपने पर उपकार व अन्यों पर परोपकार कर परमात्मा के कत्र्तव्यपरायण सपुत्र कहलाओ व विश्राम को पाओ।




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