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परमपद प्राप्ति हेतु आवश्य·—आत्मविजय

फरीदाबाद ( विनोद वैष्णव )| रामनवमी की पवित्र बेला पर आज सतयुग दर्शन वसुंधरा के प्रांगण में हवन आयोजन के उपरांत कई नवजात शिशुओं ने चोले डलवाए, उनका नामकरण हुआ व मुण्डन संस्कार समपन्न हुआ। आज सफ़ेद पोशाक व गुलानारी दुपट्टा धारे श्रद्धालुओं की बहुत भीड़ थी। आज यहाँ अनमोल मानव जीवन के परमपद को समयानुसार प्राप्त कर लेने की महत्ता पर बल देते हुए ट्रस्ट के मार्गदर्शक श्री सजन जी ने कहा कि आत्मविजय सबसे बड़ी विजय है जो इंसान को तभी प्राप्त होती है जब वह प्रत्येक कार्य अपने निजी अहं व कत्र्ता भाव को त्याग कर, ईश्वर के निमित्त, उसके हुकमानुसार करता है। अन्य श4दों में जो सब काम ईश्वर को हाजिऱ नाजिऱ जान कर, निष्काम व समर्पित भाव से शास्त्रविहित युक्ति अनुसार करता है, वह कभी नहीं हारता 1योंकि उसका सारा ध्यान विजय लक्ष्य पर केन्द्रित होता है व उसका शारीरिक-मानसिक या आत्मिक बल अथाह होता है।इस आधार पर आत्मविजय एक श्रेष्ठ सद्गुण है व साधना की चरम और दुर्लभ अवस्था है। इस अवस्था को प्राप्त करने के लिए उद्देश्य की स्पष्टता, दृढ़ इच्छा शक्ति, लगन, निष्ठा, साहस, युक्तिसंगत परिश्रम तो आवश्यक है ही साथ ही नैतिक बल, आत्मसंयम व एकाग्रचित्तता का होना भी अपरिहार्य है। इन साधनों के विकास हेतु ही सुसंगति, नियमित रूप से सत-शास्त्र का अध्ययन, चिंतन, मनन, विचार, चारों पहर नाम-अक्षर का सिमरन, ध्यान व निरंतर एक गुणी इंसान की तरह निष्काम भाव से प्रयासरत रहने की महिमा है।अत: इस तथ्य के दृष्टिगत आत्मविजयी होने के लिए सदैव अपने मनोबल को ऊँचा रखो। मन-मस्तिष्क में विजय प्राप्ति के अतिरिक्त किसी विपरीत विचार के लिए कोई स्थान न हो। याद रखो मन यदि दृढ़ है तो सफलता सुनिश्चित है। इसके विपरीत इन्द्रियाँ व मन यदि चलायमान है तो व्यक्ति शीघ्र ही तन-मन-धन व समबन्धों के प्रभाव में आ उनसे हार जाता है, फलत: विजय प्राप्ति असंभव हो जाती है। ऐसा इसलिए 1योंकि चंचल इन्द्रियाँ किसी को भी अपने वश में करने के लिए सदा उद्यत रहती हैं। अनेक तो सहज रूप में विषय रसों के गुलाम हो उनके वश में हो जाते हैं किंतु कुछ दृढ़ निश्चयी ऐसे भी होते हैं जो उन इन्द्रियों की दिशा ही मोड़ देते हैं। उन्हें बहिर्मुखी से अंतर्मुखी बना देते हैं और इन्द्रियजीत कहलाते हैं।उन्होने कहा कि आत्मविजय प्राप्त करने हेतु आप भी ऐसे ही इन्द्रियजीत बनो। इस हेतु याद रखो इन्द्रियों की ही भांति मन पर विजय पाना भी अति आवश्यक है। मन को जीत कर ही मनुष्य इस संसार में नि:स्वार्थ व अकत्र्ता भाव से कर्म करते हुए, धर्म के मार्ग पर प्रशस्त हो सकता है और सदाचारितापूर्ण सत्कर्म कर सकता है। इसके विपरीत यदि वह कुसंग के कारण ऐसा नहीं करता तो वह बुरे कामों में रत हो कुकर्म-अधर्म करने लग जाता है। अत: अपने मन और इन्द्रियों दोनों को जीतने वाले जितेन्द्रिय बनो और बड़े-बड़े प्रलोभनों के माया जाल से मुक्त हो सत्य धर्म के निष्काम रास्ते पर बने रह असीम संतोष को पाओ। इससे व्यक्तित्व शील और शक्ति का संगम स्थल बन जाएगा और आपकी जय आपके आचार-विचार व व्यवहार से प्रतिबिमिबत होगी। नतीजा ईश्वर स्वयं आगे होकर आपका अभिवादन करेंगे और आप दुर्लभ अमर पद को सहज ही प्राप्त कर आनन्द के चरमोत्कर्ष को पा अपना जीवन सफल बना लोगे।इसी संदर्भ में श्री सजन जी ने कहा कि आत्मविजय प्राप्त करने हेतु सदैव सकारात्मक बने रहते हुए अपना सार्थक विकास करो अर्थात् स्वयं की शारीरिक, मानसिक, बौद्धिक व आत्मिक क्षमताओं का विकास करने का पुरुषार्थ दिखाओ। इस तरह सर्व एकात्मा का भाव अपनाकर, एक मनुष्य से दूसरे मनुष्य के बीच व्याप्त विभेद को (जो समस्त बुराईयों, संघर्ष और अशांति का आधार है) जड़ से मिटा कर एक दूसरे के सजन बन जाओ। यकीन मानो इस यत्न द्वारा मन में छाया अपवित्रता और पाप का अंधकार स्वयं छँट जाएगा और ह्वदय आत्मप्रकाश से प्रकाशित हो जाएगा। जानो इस विशुद्ध अवस्था को प्राप्त होने पर ही, आत्मविजय के पथ पर, आत्मविश्वास के साथ स्थिर बने रह, अपने लक्ष्य को सहजता से प्राप्त कर पाओगे यानि हर्ष-विषाद, राग-द्वेष, सुख-दु:ख, जय-पराजय आदि द्वन्द्वों से ऊपर उठ और समचित्त हो समरसता से जीवन जीते हुए जीवन का वास्तविक आनन्द प्राप्त कर अमर पद प्राप्त कर यानि परमधाम पहुँच विश्राम को पाओगे ।




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